शनिवार, 20 नवंबर 2010

कांवड़ यात्रा

सावन भगवान शिव की भक्ति का महीना है। इस महीने में विभिन्न साधनों से भगवान शंकर को प्रसन्न किया जाता है। सावन के महीने में भगवान शंकर के जलाभिषेक का भी विशेष महत्व है। जलाभिषेक से शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं।
कांवड़ यात्रा का एक महत्व यह भी है कि यह हमारे व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती है।
लंबी कांवड़ यात्रा से हमारे मन में संकल्प शक्ति और आत्म विश्वास जागता है। हम अपनी क्षमताओं को पहचान सकते हैं, अपनी शक्ति का अनुमान भी लगा सकते हैं। एक तरह से कांवड़ यात्रा शिव भक्ति का एक रास्ता तो है ही साथ ही यह हमारे व्यक्तिगत विकास में भी सहायक है। यही वजह है कि श्रावण में लाखों श्रद्धालु कांवड़ में पवित्र जल लेकर एक स्थान से लेकर दूसरे स्थान जाकर शिवलिंगों का जलाभिषेक करते हैं।

ऐसा माना जाता है कि जब सारे देवता श्रावण मास में शयन करते हैं तो भोलेनाथ का अपने भक्तों के प्रति वात्सल्य जागृत हो जाता है। कांवड़ का जल केवल 12 ज्योर्तिलिंगों और स्वयंभू शिवलिंगों ( जो स्वयं प्रकट हुए हैं) पर ही चढ़ाया जाता है। प्राण प्रतिष्ठित मूर्तियों और शिवलिंगों पर कांवड़ का जल नहीं चढ़ाया जाता।

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